ऐ ज़िन्दगी कुछ हौसला तो दे

ऐ ज़िन्दगी कुछ हौसला तो  दे

ऐ ज़िन्दगी कुछ हौसला तो  दे
इम्तेहान ही लेती जा रही है                              
कुछ आराम तो दे

इन रातों को तूने  क्यों अब लंबा सा बना दिया
सपने ही नहीं आँखों में... क्या यह हाल बना दिया

कैसे कहूं तुझसे की कितना थक गया हूँ मैं
अनगिनत विचारों में कैसे धस गया हूँ मैं

किस रास्ते पर हूँ कुछ समझ नहीं पा रहा
कहाँ गयी वह पुरानी  मंज़िल कुछ नज़र नहीं आ रहा

जिस ऊँगली को पकड़  सकूँ वह हाथ तो दे
आगे बढ़  सकूँ वो  साथ तो दे

ऐ ज़िन्दगी कुछ हौसला तो दे

अमित कुमार