"प्रभु" तुझ पर तरस आ जाता है

जब आप भगवान की परिस्थितियों को देखते हैं और उस पर संदेह करना शुरू करते हैं

"प्रभु" तुझ पर तरस आ जाता है

हे प्रभु ! कभी-कभी मुझे तुझ पर तरस आ जाता है ।

मंदिर रुपी कारावास में बंदी की तरह तू कैद हो जाता है,
रिश्तेदार की तरह लोग तुझे मिलने आते है,
और तू अपनी बेगुनाही का सबूत देता नज़र आता है,
थोड़ी देर बाद वह मिलकर चले जाते है,
और तू फिर से अकेला हो जाता है ।।
हे प्रभु ! कभी-कभी मुझे तुझ पर तरस आ जाता है ।

दान के रूप में कितना धन तुझ पर चढ़ाया जाता है,
पर अफ़सोस वो तो पुजारी के पेट में चला जाता है,
और तू हर रोज़ भूखे पेट ही सो जाता है,
तू कितने लोगों का काम बनाता है,
पर तेरा काम तो अधूरा ही रह जाता है ।।
हे प्रभु ! कभी-कभी मुझे तुझ पर तरस आ जाता है ।

जरा सा टूट जाने पर तू खंडित हो जाता है,
और तुझे मंदिर से उठाकर किसी नदी में छोड़ दिया जाता है,
नदी में तू टूट-फुट कर मिट्टी बन कर किनारे पर आ जाता है,
किनारे से उठाकर कोई तुझे अपने घर ले जाता है,
सजा-सवार कर तुझे फिर से भगवान् बनाकर मंदिर में रख दिया जाता है,
और फिर से तू बेगुनाही की सजा काटता नज़र आता है ।।
हे प्रभु ! कभी-कभी मुझे तुझ पर तरस आ जाता है.

~~ अतिथि लेखक: अमित वर्मा ~~

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